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Shayari

मासूमियत के पीछे छिपे नक़ाब — भरोसे की एक कड़वी सच्चाई

2026-10-08 00:00:00
मासूमियत के पीछे छिपे नक़ाब — भरोसे की एक कड़वी सच्चाई
मासूम चेहरे और छिपी हुई असलियत पर आधारित यह कविता आज के दौर में बढ़ते दिखावे, झूठी अच्छाई और लोगों के दोहरे चरित्र पर सवाल उठाती है।
मासूमियत के पीछे छिपे हैं बहुत से नक़ाब, खुद को अच्छा दिखाकर घूमते हैं कई बेहिसाब। आजकल की दुनिया में भरोसा न कीजिए बेहिसाब, आपके बीच भी घूम सकता है कोई, चेहरे पर लिए नक़ाब। — Shivansh Singh Author | Writer | Storyteller